मृत्यु प्रकृति का अंतिम सत्य
फिर भी रहते अनभिज्ञ मदमस्त
इस सत्य को मानव करता ध्वस्त
कुकर्म करता रहता,नहीं समझता अपनत्व
झगड़ा झंझट फसाद ही समझता कर्तव्य
सुकर्म कर बढ़ाना चाहिए महत्व
तभी बढ़ेगा समाज का वैभवत्व
जाने अंजाने सभी,नहीं परखते गुरूत्व
मृत्यु चरम है खोना नहीं पौरूषत्व
आज है कल क्या होगा करते रहो कर्तव्य
कर्म सत्य है,हो न इससे विरक्त
अंतिम सत्य ध्यानकर रहना होगा मस्त

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