चांदी  उगने लगी है बालो में

तुम अब भी हसीं लगती हो

फासला बढ़ गया है जिस्मो में

रूह से पास अभी भी लगती हो

उम्र हमने गवाई तकरारों में

कुछ तेरे सच कुछ मेरे झूठ के पैमानों में

काश समझ पते जब वक्त भी था

काश छोड़ पाते जिदो को सही मोड़ पे  हम

अब तो बस यादे ही रह गयी है जमांने में

साया दीखता है जो दर्पण में

याद आता है ढांचा वो बचपन का

यारी थी कभी हमारी भी

सोचा था बूढ़े होंगे साथ में ही

उम्र गुजरी मगर वो साथ न रहा

साथ चलने का वो एहसास न रहा

चांदी  उगने लगी है बालो में

कुछ तेरे सच कुछ मेरे झूठ के पैमानों में

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