आधुनिकता में सभी की सोच अपर्याप्त है ।
अधिक से अधिक पाने की जज़्बात है ।
पुरानी संस्कृति हो रही समाप्त है ।
राजनीतिज्ञों में भूख रहती व्याप्त है ।
इन्सान इन्सान पर करती कुठाराघात है ।
अच्छे इन्सान हमेशा बोलता बेबाक़ है
इन्सान पर हरदम पड़ती आघात है ।
समाज में हर जगह असमानता व्याप्त है ।
एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगाए घात है ।

धात प्रतिघात की लड़ाई सभी जगह व्याप्त है ।
कैसे हम कहें जो प्राप्त है पर्याप्त है?

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