आज जमीं और आस्मां त्रस्त है ।
आदमी अपने कर्मों में मदमस्त है ।
जल थल नभ सभी करुणाग्रस्त है ।
पेड़ पौधा ,जीव जन्तु सब रोगग्रस्त है ।
धरती जंगल वन सभी निर्वस्त्र है ।
राजनीतिज्ञ स्वयं मैं मदमस्त हैं।
पवन अग्नि धरा सभी त्रस्त है ।
संकट में मानव जाति समस्त है।
खान पान रहन सहन सभी ज़बरदस्त है।
मानव पारिस्थितिकी को करता निरस्त है।
ग़रीबी बेरोज़गारी व्यभिचारी समस्त है ।

आदमी तो सभी मौक़ापरस्त है ।
आदमी आदमी से ही त्रस्त है ।
वातावरण भयंकर प्रदूषण ग्रस्त है ।

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